
रायपुर (CITY HOT NEWS)//

छत्तीसगढ़ में धान की फसल अब लगभग 45 दिन या उससे अधिक की हो गई है। किसानों द्वारा खरपतवार नियंत्रण के लिए खरपतवारनाशियों का प्रयोग, निराई-गुड़ाई एवं अन्य कृषि कार्य पूरे किए जा चुके हैं। साथ ही संतुलित मात्रा में उर्वरकों के प्रयोग से फसल की वृद्धि भी अच्छी हो रही है। आगामी दिनों में मौसम की परिस्थितियां धीरे-धीरे विभिन्न कीटों के प्रकोप के लिए अनुकूल हो सकती हैं। इनमें वर्तमान समय में लीफ फोल्डर (पत्ती मोड़क) तथा आगामी फसल अवस्था में पीला तना छेदक प्रमुख कीट हैं। इसे ध्यान में रखते हुए किसानों को खेतों की नियमित निगरानी करने तथा आवश्यकता के अनुसार समेकित कीट प्रबंधन अपनाने की सलाह दी गई है।
आईसीएआर-राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान के निदेशक डॉ. पी. के. राय ने किसानों से फसल की नियमित निगरानी करने तथा कीटों की प्रारंभिक अवस्था में पहचान करने की अपील की। उन्होंने कहा कि अनावश्यक एवं अंधाधुंध कीटनाशियों के प्रयोग से बचना चाहिए। “इस अवस्था में धान की फसल की नियमित निगरानी अत्यंत आवश्यक है। कीटों की संख्या आर्थिक क्षति स्तर तक पहुंचने पर ही आवश्यक नियंत्रण उपाय अपनाने से उत्पादन लागत कम करने के साथ-साथ मित्र कीटों एवं पर्यावरण का संरक्षण किया जा सकता है।”
डॉ. पंकज शर्मा, संयुक्त निदेशक ने बताया कि लीफ फोल्डर धान का प्रमुख कीट है। इसकी सूंडियां धान की पत्तियों को लंबाई में मोड़कर उनके अंदर रहकर हरे ऊतकों को खुरचकर खाती हैं। इससे पत्तियों पर सफेद धारियां दिखाई देती हैं और प्रकाश संश्लेषण की क्षमता प्रभावित होती है। अधिक प्रकोप की स्थिति में फसल की वृद्धि एवं उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। किसानों को खेत में मुड़ी हुई पत्तियों, सूंडियों तथा पत्तियों पर दिखाई देने वाले विशिष्ट क्षति लक्षणों की नियमित जांच करनी चाहिए। कीट का प्रकोप अनुशंसित आर्थिक क्षति स्तर से अधिक होने पर ही उचित नियंत्रण उपाय अपनाएं।
डॉ. शर्मा ने बताया कि फसल के आगे बढ़ने के साथ पीला तना छेदक भी महत्वपूर्ण समस्या बन सकता है। इस कीट के भूरे रंग के अंड समूह प्रायः पत्ती के सिरे के पास दिखाई देते हैं। अंडों से निकलने वाली सूंडियां तने में प्रवेश कर अंदर के ऊतकों को नुकसान पहुंचाती हैं। वानस्पतिक अवस्था में इससे “डेड हार्ट” तथा बाद की अवस्था में “व्हाइट ईयर” (सफेद बालियां) के लक्षण दिखाई देते हैं। इसलिए प्रारंभिक अवस्था में इसकी पहचान एवं नियंत्रण महत्वपूर्ण है।
किसानों को नियमित रूप से खेतों की निगरानी करने, दिखाई देने वाले अंड समूहों को एकत्र कर नष्ट करने तथा वयस्क कीटों की निगरानी के लिए फेरोमोन ट्रैप लगाने की सलाह दी गई है। आवश्यकता के अनुसार ट्राइको-कार्ड का उपयोग भी किया जा सकता है। प्रभावित एवं अत्यधिक क्षतिग्रस्त पौधों/कोंपलों को खेत से निकालकर नष्ट करने से भी कीट का प्रकोप कम किया जा सकता है। कीटनाशियों का प्रयोग केवल आवश्यकता होने पर, अनुशंसित दवा, उचित फसल अवस्था, लेबल एवं स्वीकृत मात्रा के अनुसार ही किया जाना चाहिए।
डॉ. पी. के. राय ने कहा कि समेकित कीट प्रबंधन के अंतर्गत नियमित निगरानी एवं यांत्रिक उपाय, जैविक नियंत्रण, प्राकृतिक शत्रु कीटों का संरक्षण तथा आवश्यकता आधारित कीटनाशी प्रयोग को अपनाना धान में कीट प्रबंधन का प्रभावी एवं टिकाऊ तरीका है। किसानों को आगामी सप्ताहों में अपनी फसल की विशेष निगरानी करने तथा कीटों का असामान्य प्रकोप दिखाई देने पर कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेने की आवश्यकता है।

