
- बचपन में माता-पिता के साथ जंगल जाकर तोड़ती थीं तेंदूपत्ता, आज बढ़ा पारिश्रमिक बना परिवार के लिए आर्थिक संबल
रायपुर (CITY HOT NEWS)//

जंगल की पगडंडियों से कुसुम का रिश्ता बचपन का है। कभी माता-पिता के साथ जंगल जाकर छोटे-छोटे हाथों से तेंदूपत्ता तोड़ने वाली कुसुम आज भी उसी मेहनत से अपने परिवार की आजीविका में सहयोग कर रही हैं। वर्षों से जारी इस मेहनत को जब बेहतर पारिश्रमिक मिला तो उनके चेहरे पर संतोष और खुशी साफ दिखाई दी। मनेन्द्रगढ़ विकासखंड के ग्राम बेलबहरा निवासी कुसुम की यह कहानी सेवा संकल्प अभियान 2026 के दौरान सामने आई है।
कुसुम बताती हैं कि जब वह छोटी थीं, तब अपने माता-पिता के साथ तेंदूपत्ता संग्रहण के लिए जंगल जाया करती थीं। परिवार के साथ शुरू हुआ यह काम धीरे-धीरे उनके जीवन और आजीविका का हिस्सा बन गया। आज भी तेंदूपत्ता संग्रहण के मौसम में वह जंगल पहुंचती हैं और पूरी मेहनत के साथ पत्तों का संग्रहण करती हैं।
मेहनत वही, लेकिन अब मिल रहा बेहतर पारिश्रमिक
तेंदूपत्ता संग्रहण का काम देखने में भले ही सामान्य लगे, लेकिन इसके पीछे संग्राहकों की कड़ी मेहनत छिपी होती है। जंगल में जाकर उपयुक्त पत्तों को तलाशना, उन्हें सावधानी से तोड़ना, एकत्र करना और निर्धारित तरीके से तैयार करना मेहनत और धैर्य का काम है। कुसुम वर्षों से इसी श्रम के सहारे अपने परिवार की जरूरतों को पूरा करने में योगदान देती आ रही हैं। इस वर्ष राज्य शासन द्वारा तेंदूपत्ता संग्रहण की पारिश्रमिक दर बढ़ाकर 5,500 रुपये प्रति मानक बोरा किए जाने से कुसुम की खुशी बढ़ गई है। वर्ष 2026 में बढ़ी हुई दर से मिलने वाला पारिश्रमिक उनके लिए आर्थिक राहत के साथ उनकी वर्षों की मेहनत को मिला सम्मान भी है।
कुसुम कहती हैं कि जंगल में दिनभर मेहनत करने के बाद जब उसका बेहतर मूल्य मिलता है तो खुशी होती है। बढ़ी हुई संग्रहण दर से प्राप्त राशि परिवार की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने में सहायक बन रही है। इससे घर के जरूरी खर्चों को संभालने में भी आसानी हो रही है।
बढी दर ने दिया आर्थिक संबल
तेंदूपत्ता संग्रहण केवल कुसुम ही नहीं, बल्कि जंगल और वनोपज पर निर्भर अनेक परिवारों की मौसमी आय का महत्वपूर्ण जरिया है। ऐसे में संग्रहण दर में वृद्धि से इन परिवारों को उनकी मेहनत का बेहतर प्रतिफल मिल रहा है। कुसुम के लिए भी बढ़ा हुआ पारिश्रमिक परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने में अतिरिक्त सहारा बना है। वर्षों से तेंदूपत्ता संग्रहण कर रहीं कुसुम के लिए यह बदलाव विशेष मायने रखता है। जिस काम को उन्होंने बचपन में माता-पिता के साथ शुरू किया था, उसी काम के लिए आज पहले से बेहतर पारिश्रमिक मिलना उनके लिए सुखद अनुभव है। वह इसे मेहनतकश तेंदूपत्ता संग्राहकों के श्रम को मिले सम्मान के रूप में देखती हैं।
मेहनत का बेहतर मूल्य मिलने से बढ़ी खुशी
कुसुम का कहना है कि तेंदूपत्ता तोड़ने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है। बढ़ी हुई दर से अब इस मेहनत का बेहतर मूल्य मिल रहा है। इससे उनके जैसे अनेक संग्राहक परिवारों को आर्थिक राहत मिली है और काम के प्रति उत्साह भी बढ़ा है। उन्होंने तेंदूपत्ता संग्राहकों के हित में किए गए प्रयासों के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी एवं मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के प्रति आभार व्यक्त किया है। उनका कहना है कि पारिश्रमिक में वृद्धि से जंगल पर निर्भर परिवारों को अपनी मेहनत का बेहतर मूल्य और आर्थिक संबल मिल रहा है।
सेवा संकल्प अभियान में सामने आ रहीं बदलाव की कहानियां
17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक आयोजित सेवा संकल्प अभियान 2026 के माध्यम से जनसेवा और जनभागीदारी को बढ़ावा देने के साथ केंद्र एवं राज्य शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं एवं पहलों की जानकारी आमजन तक पहुंचाई जा रही है। साथ ही इन पहलों से नागरिकों के जीवन में आए सकारात्मक बदलावों की कहानियों को सामने लाया जा रहा है।ग्राम बेलबहरा की कुसुम की कहानी भी इसी बदलाव की एक तस्वीर है। बचपन से जंगल में तेंदूपत्ता संग्रहण कर अपने परिवार का हाथ बंटाने वाली कुसुम को आज अपनी मेहनत का बेहतर मोल मिल रहा है। बढ़ी हुई संग्रहण दर ने न केवल उनके परिवार को आर्थिक सहारा दिया है, बल्कि वर्षों से किए जा रहे उनके श्रम को सम्मान और चेहरे पर नई खुशी भी दी है।

